Sahitya Ka Aatm Satya

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Bol हिन्दी के अग्रणी रचनाकार के साथ-साथ देश के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिने जानेवाले निर्मल वर्मा ने जहाँ हिन्दी को एक नई कथाभाषा दी वहीं एक नवीन चिन्तन भाषा के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनका साहित्य और चिन्तन न केवल उत्तर-औपनिवेशिक समाज में मौजूद कुछ बहुत मौलिक प्रश्नों और चिन्ताओं को रेखांकित करता है, बल्कि एक लेखक की गहरी बौद्धिक और आध्यात्मिक विकलता को भी व्यक्त करता है। उनका चिन्तनपरक निबन्ध-साहित्य भारतीय परम्परा और पश्चिम की चुनौतियों के द्वन्द्व की नई समझ भी हमें देता है। इतिहास और स्मृति उनके प्रिय प्रत्यय हैं। उनके चिन्तन में इतिहास के ठोस और विशिष्ट अनुभव हैं। उनका इतिहास-बोध बहुत को भुलाकर रचा-बसा बोध नहीं है बल्कि वह भूलने के षड्यंत्र को लगातार प्रतिरोध देता है जिसका मूलाधार स्मृति है। वहाँ परम्परा स्मृति का अंग भी है और इसे सहेजने-समझने का साधन भी। भाषा के सवाल को निर्मल वर्मा साहित्य तक ही सीमित नहीं मानते। उनका मानना है कि एक पूरी संस्कृति के मर्म और अर्थों को सम्प्रेषित करने की सम्भावना उसके भीतर अन्तर्निहित है। वे सवाल उठाते हैं कि यदि हम वैचारिक रूप से स्वयं अपनी भाषा में सोचने, सृजन करने की सामर्थ्य नहीं जुटा पाते तो हमारी राजनैतिक स्वतंत्रता का क्या मूल्य रह जाएगा? इस पुस्तक में उनके निबन्ध, कुछ प्रश्नोत्तर और विभिन्न पुरस्कारों को स्वीकार करते समय दिए गए वक्तव्य भी शामिल हैं।

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हिन्दी के अग्रणी रचनाकार के साथ-साथ देश के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिने जानेवाले निर्मल वर्मा ने जहाँ हिन्दी को एक नई कथाभाषा दी वहीं एक नवीन चिन्तन भाषा के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनका साहित्य और चिन्तन न केवल उत्तर-औपनिवेशिक समाज में मौजूद कुछ बहुत मौलिक प्रश्नों और चिन्ताओं को रेखांकित करता है, बल्कि एक लेखक की गहरी बौद्धिक और आध्यात्मिक विकलता को भी व्यक्त करता है। उनका चिन्तनपरक निबन्ध-साहित्य भारतीय परम्परा और पश्चिम की चुनौतियों के द्वन्द्व की नई समझ भी हमें देता है। इतिहास और स्मृति उनके प्रिय प्रत्यय हैं। उनके चिन्तन में इतिहास के ठोस और विशिष्ट अनुभव हैं। उनका इतिहास-बोध बहुत को भुलाकर रचा-बसा बोध नहीं है बल्कि वह भूलने के षड्यंत्र को लगातार प्रतिरोध देता है जिसका मूलाधार स्मृति है। वहाँ परम्परा स्मृति का अंग भी है और इसे सहेजने-समझने का साधन भी। भाषा के सवाल को निर्मल वर्मा साहित्य तक ही सीमित नहीं मानते। उनका मानना है कि एक पूरी संस्कृति के मर्म और अर्थों को सम्प्रेषित करने की सम्भावना उसके भीतर अन्तर्निहित है। वे सवाल उठाते हैं कि यदि हम वैचारिक रूप से स्वयं अपनी भाषा में सोचने, सृजन करने की सामर्थ्य नहीं जुटा पाते तो हमारी राजनैतिक स्वतंत्रता का क्या मूल्य रह जाएगा? इस पुस्तक में उनके निबन्ध, कुछ प्रश्नोत्तर और विभिन्न पुरस्कारों को स्वीकार करते समय दिए गए वक्तव्य भी शामिल हैं।


Productspecificaties

Merk Rajkamal Prakashan
EAN
  • 9789360860035
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