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"(रामकथामृत) साहित्य मनीषियों के मतानुसार अब तक उपलब्ध काव्यमय रामकथाओं की गणना दो सौ से अधिक मानी जाती है। इस पुनीत सृजन में सर्वान्तर्यामी प्रभु श्रीराम, उनकी परम आह्लादिनी शक्ति श्री सीताजी तथा भ्राताओं श्री भरत, श्री लक्ष्मण तथा श्री शत्रुघ्न के साथ परिजन तथा पुरजनों के प्रति अकिंचन का एक विनम्र प्रयास है। अवध के राजभवन से प्रारम्भ होकर यह प्रबंध काव्य ""वनवासी राम"" की प्रभुतामयी लीलाओं के साथ असुर-अधमों के संहार के उपरांत ""राम राज्य"" की उद्घोषणा के साथ समाप्त होता है।राष्ट्रकवि श्री मैथिलिशरण जी के शब्दों में ""राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है""।"
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