Aastha Ke Swar

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Bol आस्था के स्वर में लेखक धीरेन्द्र वर्मा ने निराशा और हताशा के दौर से गुजर रही आज की पीढ़ी के समक्ष एक ऐसे पात्र को पेश किया है जो हाल की चुनौतियों को बिना किसी प्रकार का समझौता किए निर्विकार भाव से झेल जाता है। संघर्षों की राह में उसके साथ होता है एक पुरुष—एक सुदर्शन पुरुष जो उसे भटकने से रोकता है। वह जो अदृश्य होते हुए भी सच्चा पथ-प्रदर्शक है, सृष्टि के उस काल का प्रतिनिधित्व करता है जो हमारे जीवन से बहुत पहले था और उसके बहुत बाद तक रहेगा। धीरेन्द्र वर्मा ने आस्था के स्वर के माध्यम से उन बिन्दुओं को रेखांकित किया है जहाँ से भटकाव शुरू होता है और उससे बचने के लिए उस प्रकाश का परिचय दिया है जो हर समय हमारे साथ रहता है, परन्तु हम उसकी सहायता नहीं ले पाते। केवल हमारी आत्मा, हमारा विवेक ही उस अदृश्य शक्ति से ऊर्जस्वित होकर प्रकाश बिन्दुओं से जुड़ पाता है। यह पुस्तक उन परिभाषाओं को तोड़ने का प्रयास भी करती है जिन्हें आज के समाज में धन-बल और बाहुबल ने नए सिरे से गढ़ने का काम किया है। भटकाव के इस दौर में धीरेन्द्र वर्मा की यह पुस्तक सचमुच पथ-प्रदर्शक की भूमिका अदा करेगी।

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आस्था के स्वर में लेखक धीरेन्द्र वर्मा ने निराशा और हताशा के दौर से गुजर रही आज की पीढ़ी के समक्ष एक ऐसे पात्र को पेश किया है जो हाल की चुनौतियों को बिना किसी प्रकार का समझौता किए निर्विकार भाव से झेल जाता है। संघर्षों की राह में उसके साथ होता है एक पुरुष—एक सुदर्शन पुरुष जो उसे भटकने से रोकता है। वह जो अदृश्य होते हुए भी सच्चा पथ-प्रदर्शक है, सृष्टि के उस काल का प्रतिनिधित्व करता है जो हमारे जीवन से बहुत पहले था और उसके बहुत बाद तक रहेगा। धीरेन्द्र वर्मा ने आस्था के स्वर के माध्यम से उन बिन्दुओं को रेखांकित किया है जहाँ से भटकाव शुरू होता है और उससे बचने के लिए उस प्रकाश का परिचय दिया है जो हर समय हमारे साथ रहता है, परन्तु हम उसकी सहायता नहीं ले पाते। केवल हमारी आत्मा, हमारा विवेक ही उस अदृश्य शक्ति से ऊर्जस्वित होकर प्रकाश बिन्दुओं से जुड़ पाता है। यह पुस्तक उन परिभाषाओं को तोड़ने का प्रयास भी करती है जिन्हें आज के समाज में धन-बल और बाहुबल ने नए सिरे से गढ़ने का काम किया है। भटकाव के इस दौर में धीरेन्द्र वर्मा की यह पुस्तक सचमुच पथ-प्रदर्शक की भूमिका अदा करेगी।


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Merk Rajkamal Prakashan
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  • 9789390971046
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