इस पुस्तक में संग्रहित कविताएँ एक अंतर्मुखी मन की उलझन, पीड़ा और आशाओं को व्यक्त करती हैं। ये मन में पनप रही इच्छाओं को तो उभारती ही हैं, कहीं आध्यात्मिक स्वर में दार्शनिक प्रश्नों को भी छेड़ती है। इन कविताओं में ये जगत और प्रकृति विद्यमान है, तो इससे परे जो भी सत्ता है उस ओर झांकने का प्रयास भी है। ये मन में उठते राग और विराग की अभिव्यक्ति हैं।
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