Ayodhya Mein Kalpurush

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Bol कविता प्रकारांतर से हर दौर में सभ्यता-समीक्षा रही है। कवि बोधिसत्व की ये ताजा कविताएँ इस बेहद जटिल समय की महत्त्वपूर्ण गवाही रच रही हैं। कविता और समय के रिश्तों की यह पड़ताल, एक ऐसे दौर में जब अंधकार, हिंसा, उत्पीड़न, नियंत्रण, सन्देह, बेबसी और अनिश्चय से भरे संसार में मनुष्य होने के किसी सार-तत्त्व की खोज एक कठिन चुनौती है, रचनाकार की यह पेशकश बहुत मानीखेज है। यह नवाचार आज बहुत अर्थ रखता है। कवि ने मिथक कथाओं, जनश्रुतियों, और घोर वर्तमान के रिश्तों को जिस प्रकार से बुना है, उनमें स्थितियों और मनोभावों की आँच में सारे समय पिघलकर स्मृति के एक बीहड़ प्रदेश को रच रहे हैं। तीव्र गति से बीतते किसी तर्कातीत क्रम के भीतर दृश्य-खंड, दिशाएँ और गंतव्य सब यहाँ एक दूसरे में लिथड़े हुए हैं और समय बोध का एक विराट फलक उपस्थित हो रहा है। इस फलक पर व्यथाओं के अनचीह्ने इलाके और मनोभावों के नानाविध रूपाकार हमें उन सारे सन्दर्भों में ले जा रहे हैं जो दिखकर भी नहीं दिखते। चेतना के धुँधलाए से धरातलों पर उभरते हुए वहाँ बहुत से किरदार हैं, जो एक दूसरे में गड्डमड्ड हो एक ऐसे वृत्तान्त को रच रहे हैं जो अशान्त मन की विकलता से उपजा है; जो किसी डरावने सच को उकेर रहा है। महत्त्वपूर्ण यह कि इस नैरेटिव में कुछ भी सुनिश्चित, तार्किक, क्रमबद्ध और स्थाई नहीं, बल्कि यहाँ शक्ति-संरचनाओं की घेराबन्दी और उनमें जन्मता कोई दु:स्वप्न ही बचा रह गया है। अनर्गल शोर, तीव्रता, आकस्मिकताओं और छीना-झपटी से सना वह खौफनाक मंजर जिसमें अनसुने क्लेश, हाशिए पर छूट गए चीत्कारों और दबी हुई पीड़ाओं के कंपन हैं। एक कविता जो इस तरह समय के आर-पार जाती हुई सारी संहिताओं, हदबन्दी और जकड़नों को ध्वस्त करती है, गहन व्यथा के संकेतों को उकेर सकती है, वह प्रकारान्तर से सृजन के उस आदिम विश्वास को ही पाना चाहती है जो हमेशा से शक्ति-संरचनाओं का प्रतिपक्ष रहा है। यह वह जमीन है जहाँ हर रचनाकार को लौटना होता है—उस क्षत-विक्षत विश्वास की रक्षा की खातिर जो फिर भी कहीं सदा स्पन्दित होता रहता है। बोधिसत्व ने समकालीन कविता के बहुत से रूढ़ मुहावरों से बाहर निकलने की कोशिश की है। इन कविताओं का निश्चय ही भरपूर स्वागत किया जाएगा। —विजय कुमार

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कविता प्रकारांतर से हर दौर में सभ्यता-समीक्षा रही है। कवि बोधिसत्व की ये ताजा कविताएँ इस बेहद जटिल समय की महत्त्वपूर्ण गवाही रच रही हैं। कविता और समय के रिश्तों की यह पड़ताल, एक ऐसे दौर में जब अंधकार, हिंसा, उत्पीड़न, नियंत्रण, सन्देह, बेबसी और अनिश्चय से भरे संसार में मनुष्य होने के किसी सार-तत्त्व की खोज एक कठिन चुनौती है, रचनाकार की यह पेशकश बहुत मानीखेज है। यह नवाचार आज बहुत अर्थ रखता है। कवि ने मिथक कथाओं, जनश्रुतियों, और घोर वर्तमान के रिश्तों को जिस प्रकार से बुना है, उनमें स्थितियों और मनोभावों की आँच में सारे समय पिघलकर स्मृति के एक बीहड़ प्रदेश को रच रहे हैं। तीव्र गति से बीतते किसी तर्कातीत क्रम के भीतर दृश्य-खंड, दिशाएँ और गंतव्य सब यहाँ एक दूसरे में लिथड़े हुए हैं और समय बोध का एक विराट फलक उपस्थित हो रहा है। इस फलक पर व्यथाओं के अनचीह्ने इलाके और मनोभावों के नानाविध रूपाकार हमें उन सारे सन्दर्भों में ले जा रहे हैं जो दिखकर भी नहीं दिखते। चेतना के धुँधलाए से धरातलों पर उभरते हुए वहाँ बहुत से किरदार हैं, जो एक दूसरे में गड्डमड्ड हो एक ऐसे वृत्तान्त को रच रहे हैं जो अशान्त मन की विकलता से उपजा है; जो किसी डरावने सच को उकेर रहा है। महत्त्वपूर्ण यह कि इस नैरेटिव में कुछ भी सुनिश्चित, तार्किक, क्रमबद्ध और स्थाई नहीं, बल्कि यहाँ शक्ति-संरचनाओं की घेराबन्दी और उनमें जन्मता कोई दु:स्वप्न ही बचा रह गया है। अनर्गल शोर, तीव्रता, आकस्मिकताओं और छीना-झपटी से सना वह खौफनाक मंजर जिसमें अनसुने क्लेश, हाशिए पर छूट गए चीत्कारों और दबी हुई पीड़ाओं के कंपन हैं। एक कविता जो इस तरह समय के आर-पार जाती हुई सारी संहिताओं, हदबन्दी और जकड़नों को ध्वस्त करती है, गहन व्यथा के संकेतों को उकेर सकती है, वह प्रकारान्तर से सृजन के उस आदिम विश्वास को ही पाना चाहती है जो हमेशा से शक्ति-संरचनाओं का प्रतिपक्ष रहा है। यह वह जमीन है जहाँ हर रचनाकार को लौटना होता है—उस क्षत-विक्षत विश्वास की रक्षा की खातिर जो फिर भी कहीं सदा स्पन्दित होता रहता है। बोधिसत्व ने समकालीन कविता के बहुत से रूढ़ मुहावरों से बाहर निकलने की कोशिश की है। इन कविताओं का निश्चय ही भरपूर स्वागत किया जाएगा। —विजय कुमार


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  • 9789360866013
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