Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Aarakshan

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Bol भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था। आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती है। ‘जातियों का लोकतंत्र’ शृंखला की यह पुस्तक भारत में आरक्षण की अवधारणा के पैदा होने, उसके लागू किए जाने, उसके विरोध और उसके समर्थन आदि हर पहलू पर विचार करती है। इसमें संकलित एक-एक आलेख को आरक्षण पर केन्द्रित प्रामाणिक अध्ययन माना जा सकता है, जिन्हें इसके सम्पादक, अरविन्द मोहन ने निश्चय ही इस उद्देश्य से जुटाया है कि हम आज, जबकि आरक्षण को बस एक चुनावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, यह जान सकें कि आरक्षण बतौर एक व्यवस्था और बतौर एक विचार क्या है! यह पुस्तक आरक्षण के पीछे के तर्कों, इसे लेकर हुई बहसों, तथ्यों और विकल्पों, सबसे अवगत कराती है। इसके अध्ययन से एक सामान्य पाठक भी जान सकेगा कि लगातार बहस में रहनेवाले आरक्षण को लेकर हमें एक सामाजिक रूप में कैसे सोचना चाहिए; कि क्या वह महज एक आर्थिक प्रश्न है, या कि उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्योचित व्यवहार और सम्मान से भी है!

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भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था। आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती है। ‘जातियों का लोकतंत्र’ शृंखला की यह पुस्तक भारत में आरक्षण की अवधारणा के पैदा होने, उसके लागू किए जाने, उसके विरोध और उसके समर्थन आदि हर पहलू पर विचार करती है। इसमें संकलित एक-एक आलेख को आरक्षण पर केन्द्रित प्रामाणिक अध्ययन माना जा सकता है, जिन्हें इसके सम्पादक, अरविन्द मोहन ने निश्चय ही इस उद्देश्य से जुटाया है कि हम आज, जबकि आरक्षण को बस एक चुनावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, यह जान सकें कि आरक्षण बतौर एक व्यवस्था और बतौर एक विचार क्या है! यह पुस्तक आरक्षण के पीछे के तर्कों, इसे लेकर हुई बहसों, तथ्यों और विकल्पों, सबसे अवगत कराती है। इसके अध्ययन से एक सामान्य पाठक भी जान सकेगा कि लगातार बहस में रहनेवाले आरक्षण को लेकर हमें एक सामाजिक रूप में कैसे सोचना चाहिए; कि क्या वह महज एक आर्थिक प्रश्न है, या कि उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्योचित व्यवहार और सम्मान से भी है!


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  • 9789360861681
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