"काँच के पुल" एक संग्रह है-नाज़ुक, पारदर्शी, और सच के आसपास भटकता हुआ। इन कविताओं में जहाँ एक ओर आत्ममंथन है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विसंगतियों की गूंज भी है। कभी ये कविताएँ ख़ालीपन की तहों में उतरती हैं, तो कभी पुराने दोस्तों की मुस्कान लिए लौट आती हैं। ये कविता-संग्रह उस अदृश्य पुल की तरह है जो हमें इस व्यस्त और भटकी हुई दुनिया में थोड़ी देर के लिए ठहरा देता है। यह किताब उन पाठकों के लिए है-जो अपने भीतर के संवादों को सुनना चाहते हैं,जो शब्दों से बनी खामोश राहों पर चलना जानते हैं।
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