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Bol हिन्दी कविता के लोकतंत्र और लोकायतन में विनोद कुमार शुक्ल की कविता अनूठी सहजता के साथ उपस्थित मिलती है। विनोद कुमार शुक्ल जीवन के विपुल वैविध्य को नगण्य प्रतीत होते उदाहरणों में अनुभव करते हैं। यह ‘मुलायम मामूलीपन’ उनकी कविता में आकर संवेदना का अक्षर-आलेख बन जाता है। कभी के बाद अभी विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं का वह संग्रह है जिस पर कवि के लम्बे जीवनानुभव की सजग छायाएँ हैं। इन छायाओं के बीच जितना दिखना चाहिए उतना ही दिखता है, अतिरिक्त कुछ भी नहीं। शब्दों की अन्तर्ध्वनियों और उनके सहजीवन के पारखी विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ मन्द्र स्वरों में व्यक्त होती हैं। वे कहते हैं, ‘चुप रहने को भी सुन लेना/जीवन की उम्मीद से।’ घर, पड़ोस, मृत्यु, जन्म सरीखे बीज-शब्द इस संग्रह की रचनाओं में अँखुए की तरह उकसे दिखाई देते हैं। ऐसे बहुतेरे शब्दों से हरे-भरे जीवन की शाश्वत सरलता पर कवि मुग्ध है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्धों के साझा-सौन्दर्य को कवि भाँति-भाँति से व्यक्त करता है। इसके पश्चात् भी जाने कितना है जो अल्पविराम के बाद और पूर्णविराम से पहले अनुभव किया जा सकता है। अपूर्णता की गरिमा और सार्थकता को भी विनोद कुमार शुक्ल ने रेखांकित किया है। इसका महत्त्व चीन्हते हुए लिखते हैं, ‘इस असमाप्त अधूरे से भरे जीवन को/अभी अधूरा न माना जाए/कि जीवन भरपूर जिया गया।’ प्रस्तुत कविता-संग्रह विनोद कुमार शुक्ल की रचनाशीलता की अद्वितीय आभा का एक और आयाम है।

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हिन्दी कविता के लोकतंत्र और लोकायतन में विनोद कुमार शुक्ल की कविता अनूठी सहजता के साथ उपस्थित मिलती है। विनोद कुमार शुक्ल जीवन के विपुल वैविध्य को नगण्य प्रतीत होते उदाहरणों में अनुभव करते हैं। यह ‘मुलायम मामूलीपन’ उनकी कविता में आकर संवेदना का अक्षर-आलेख बन जाता है। कभी के बाद अभी विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं का वह संग्रह है जिस पर कवि के लम्बे जीवनानुभव की सजग छायाएँ हैं। इन छायाओं के बीच जितना दिखना चाहिए उतना ही दिखता है, अतिरिक्त कुछ भी नहीं। शब्दों की अन्तर्ध्वनियों और उनके सहजीवन के पारखी विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ मन्द्र स्वरों में व्यक्त होती हैं। वे कहते हैं, ‘चुप रहने को भी सुन लेना/जीवन की उम्मीद से।’ घर, पड़ोस, मृत्यु, जन्म सरीखे बीज-शब्द इस संग्रह की रचनाओं में अँखुए की तरह उकसे दिखाई देते हैं। ऐसे बहुतेरे शब्दों से हरे-भरे जीवन की शाश्वत सरलता पर कवि मुग्ध है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्धों के साझा-सौन्दर्य को कवि भाँति-भाँति से व्यक्त करता है। इसके पश्चात् भी जाने कितना है जो अल्पविराम के बाद और पूर्णविराम से पहले अनुभव किया जा सकता है। अपूर्णता की गरिमा और सार्थकता को भी विनोद कुमार शुक्ल ने रेखांकित किया है। इसका महत्त्व चीन्हते हुए लिखते हैं, ‘इस असमाप्त अधूरे से भरे जीवन को/अभी अधूरा न माना जाए/कि जीवन भरपूर जिया गया।’ प्रस्तुत कविता-संग्रह विनोद कुमार शुक्ल की रचनाशीलता की अद्वितीय आभा का एक और आयाम है।


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  • 9789392757006
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