Khwab Sa Kuchh

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Bol उपन्यास पढ़ना शुरू करते ही, यह महसूस होने लगता है कि यह एक कवि की गद्यकथा है। बेशक इसकी लय गति थोड़ी तीव्र है, और आँखों के सामने उपस्थित होने वाले दृश्य, तुरन्त कथा प्रवाह में बिला जाते हुए लगते हैं। लेकिन इसकी गति में मौजूद सहज घुलनशीलता स्मृति में बहुत कुछ बचाए रखती है, कि हम उसे अपने अनुभवों के आईने में अपने अंतरंग और आत्मीय की तरह सजीवता में देख सकें और तब 'ख्वाब सा कुछ' में 'सच सा कुछ' देखते हुए हम जान पाते हैं, कि शायद सच से बढ़कर दूसरा कोई सपना है भी नहीं। गाँव और कस्बे के यथार्थ जीवन को उपन्यासकार, कुछ इस तरह से लिखता है कि, वह ब्यौरों के चित्रण में सिमटने और सीमित हो जाने के बदले, विडम्बना और आत्म-व्यंग्य से समृद्ध रूपकीय विन्यास जैसा लगने लगता है। चरित्र, कथानक या सामाजिक परिवेश, इस व्यापक व्यंजकता में एकदम घुले मिले लगते हैं। ऐंठबहार, घुमनाहा और बुतरू के परिवार का अतीत और वर्तमान, लेखक की लिखत में कुछ इस तरह विन्यस्त हो सका है कि हम उन्हें उनसे भिन्न किसी भी परिवार और परिवेश में देख और पा सकते हैं। उपन्यास में यौन वर्जना ग्रस्त भारतीय समाज के जो रूप उभरते हैं, वे भी केवल यथार्थ निर्देश नहीं करते, बल्कि पूरे समाज की आत्मरुद्धता की ओर सार्थक संकेत करते प्रतीत होते हैं। लेकिन उपन्यास के पाठ में सबसे महत्त्वपूर्ण उसकी पठनीयता है जो विविध मानसिकता के पाठकों को भी बाँधे रखने की अजब किस्सागोई से सम्पन्न है। —प्रभात त्रिपाठी

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उपन्यास पढ़ना शुरू करते ही, यह महसूस होने लगता है कि यह एक कवि की गद्यकथा है। बेशक इसकी लय गति थोड़ी तीव्र है, और आँखों के सामने उपस्थित होने वाले दृश्य, तुरन्त कथा प्रवाह में बिला जाते हुए लगते हैं। लेकिन इसकी गति में मौजूद सहज घुलनशीलता स्मृति में बहुत कुछ बचाए रखती है, कि हम उसे अपने अनुभवों के आईने में अपने अंतरंग और आत्मीय की तरह सजीवता में देख सकें और तब 'ख्वाब सा कुछ' में 'सच सा कुछ' देखते हुए हम जान पाते हैं, कि शायद सच से बढ़कर दूसरा कोई सपना है भी नहीं। गाँव और कस्बे के यथार्थ जीवन को उपन्यासकार, कुछ इस तरह से लिखता है कि, वह ब्यौरों के चित्रण में सिमटने और सीमित हो जाने के बदले, विडम्बना और आत्म-व्यंग्य से समृद्ध रूपकीय विन्यास जैसा लगने लगता है। चरित्र, कथानक या सामाजिक परिवेश, इस व्यापक व्यंजकता में एकदम घुले मिले लगते हैं। ऐंठबहार, घुमनाहा और बुतरू के परिवार का अतीत और वर्तमान, लेखक की लिखत में कुछ इस तरह विन्यस्त हो सका है कि हम उन्हें उनसे भिन्न किसी भी परिवार और परिवेश में देख और पा सकते हैं। उपन्यास में यौन वर्जना ग्रस्त भारतीय समाज के जो रूप उभरते हैं, वे भी केवल यथार्थ निर्देश नहीं करते, बल्कि पूरे समाज की आत्मरुद्धता की ओर सार्थक संकेत करते प्रतीत होते हैं। लेकिन उपन्यास के पाठ में सबसे महत्त्वपूर्ण उसकी पठनीयता है जो विविध मानसिकता के पाठकों को भी बाँधे रखने की अजब किस्सागोई से सम्पन्न है। —प्रभात त्रिपाठी


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  • 9788119996773
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