कभी राधा करे कृष्ण से विनती, कभी बात हो इससे उलटी एक रुठे और एक मनाये, माया है इससे ही उपजीजन्म उन्हीं से होता जग का, उनकी ही इच्छा से चलता निंद्रा जब नैनों में झलके, हो जाता है अन्त खेल का
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