Navan Dashak : Naven Ki Hindi Kavita Par Ekagra

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Bol युवा कवि-उपन्यासकार-आलोचक अविनाश मिश्र की यह पुस्तक उनके द्वारा नवें दशक के नौ कवियों पर किए गए व्यवस्थित चिन्तन की प्रस्तुति है। इन आलेखों में उन्होंने समकालीन आलोचना की स्वीकृत-प्रचलित परिपाटी से हटकर जिस तरह नवें दशक की कविता और उसके कवियों को समझा है, वह हिन्दी आलोचना में मौजूद एक बड़ी ख़ाली जगह को भी भरता है, और कविता के साथ आलोचना के भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करता है। उन्हीं के शब्दों में : नवाँ दशक नए तक पहुँचने की आँधीनुमा चाल का काल है। इस काल में बहुत कुछ अतीत का अंग होकर अप्रासंगिक होने के लिए अभिशप्त है। यहाँ एक स्थिति दूसरी स्थिति को बहुत तीव्रता से अपदस्थ कर रही है। यह सांस्कृतिक स्पन्दनों, मानवीय सम्बन्धों और पृथ्वी के नए सिरे से परिभाषित होने की घड़ी है। यह 'विचारधारा पर विचार' का समय है। यह वैश्वीकरण के तीव्र प्रवाह में अपनी जड़ें और प्राचीन रुचियाँ गँवाकर बाज़ार में गड्डमड्ड हो जाने का वर्तमान है। इस दौर का साहित्य मूलत: बाज़ार में रहकर बाज़ार-विरोध या अधिक तर्कयुक्त ढंग से कहें तो बाज़ारवाद-विरोध का साहित्य है। इस महादृश्य में हिन्दी कविता ने अपने काम को बहुत फैला लिया। उसने अपने दायरे से बाहर देखना शुरू किया। उसने अपनी और अपने से गुज़र रहे जन की आँखें पीछे की ओर भी उत्पन्न कीं और इस प्रकार वास्तविक शत्रुओं की शिनाख़्त की। उसका काम कम से चलना बन्द हो गया। वह हाशियों तक फैलती चली गई। वह गति के साथ रही और यथार्थ के भी। वह सही अर्थों में समकालीन रही और उसने अपने ठीक पहले की कविता से बहुत अलग नज़र आने के कार्य भार को भी तरजीह दी। अविनाश मिश्र ने इन आलेखों में इस निर्णायक कविता-समय को उसी समग्रता में पकड़ा है जिसकी ज़रूरत इस कार्यभार के लिए थी। पूर्व-कथन के रूप में एक लम्बा आलेख इस पुस्तक के लिए उन्होंने विशेष तौर पर लिखा है जिसमें बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में सामने आए कवियों पर एक विहंगम दृष्टि डाली है। पुनः उन्हीं के शब्दों में हिन्दी आलोचना पर यह भी एक आक्षेप है कि वह प्राय: प्रतिष्ठित को प्रतिष्ठित और उपस्थित को उपेक्षित करती/रखती है। इस अर्थ में यह आलोचना-पुस्तक पूर्णत: उपस्थित को सम्बोधित है।

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युवा कवि-उपन्यासकार-आलोचक अविनाश मिश्र की यह पुस्तक उनके द्वारा नवें दशक के नौ कवियों पर किए गए व्यवस्थित चिन्तन की प्रस्तुति है। इन आलेखों में उन्होंने समकालीन आलोचना की स्वीकृत-प्रचलित परिपाटी से हटकर जिस तरह नवें दशक की कविता और उसके कवियों को समझा है, वह हिन्दी आलोचना में मौजूद एक बड़ी ख़ाली जगह को भी भरता है, और कविता के साथ आलोचना के भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करता है। उन्हीं के शब्दों में : नवाँ दशक नए तक पहुँचने की आँधीनुमा चाल का काल है। इस काल में बहुत कुछ अतीत का अंग होकर अप्रासंगिक होने के लिए अभिशप्त है। यहाँ एक स्थिति दूसरी स्थिति को बहुत तीव्रता से अपदस्थ कर रही है। यह सांस्कृतिक स्पन्दनों, मानवीय सम्बन्धों और पृथ्वी के नए सिरे से परिभाषित होने की घड़ी है। यह 'विचारधारा पर विचार' का समय है। यह वैश्वीकरण के तीव्र प्रवाह में अपनी जड़ें और प्राचीन रुचियाँ गँवाकर बाज़ार में गड्डमड्ड हो जाने का वर्तमान है। इस दौर का साहित्य मूलत: बाज़ार में रहकर बाज़ार-विरोध या अधिक तर्कयुक्त ढंग से कहें तो बाज़ारवाद-विरोध का साहित्य है। इस महादृश्य में हिन्दी कविता ने अपने काम को बहुत फैला लिया। उसने अपने दायरे से बाहर देखना शुरू किया। उसने अपनी और अपने से गुज़र रहे जन की आँखें पीछे की ओर भी उत्पन्न कीं और इस प्रकार वास्तविक शत्रुओं की शिनाख़्त की। उसका काम कम से चलना बन्द हो गया। वह हाशियों तक फैलती चली गई। वह गति के साथ रही और यथार्थ के भी। वह सही अर्थों में समकालीन रही और उसने अपने ठीक पहले की कविता से बहुत अलग नज़र आने के कार्य भार को भी तरजीह दी। अविनाश मिश्र ने इन आलेखों में इस निर्णायक कविता-समय को उसी समग्रता में पकड़ा है जिसकी ज़रूरत इस कार्यभार के लिए थी। पूर्व-कथन के रूप में एक लम्बा आलेख इस पुस्तक के लिए उन्होंने विशेष तौर पर लिखा है जिसमें बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में सामने आए कवियों पर एक विहंगम दृष्टि डाली है। पुनः उन्हीं के शब्दों में हिन्दी आलोचना पर यह भी एक आक्षेप है कि वह प्राय: प्रतिष्ठित को प्रतिष्ठित और उपस्थित को उपेक्षित करती/रखती है। इस अर्थ में यह आलोचना-पुस्तक पूर्णत: उपस्थित को सम्बोधित है।


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Merk Rajkamal Prakashan
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  • 9789360862459
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