कुछ रिश्ते पूरे नहीं होते, पर छूटते भी नहीं। रंजिश ही सही उन्हीं रिश्तों की किताब है जहाँ इंतज़ार आदत बन जाता है, और ख़ामोशी सबसे सच्ची ज़ुबान। इन कविताओं में न कोई इल्ज़ाम है, न कोई गुज़ारिश; सिर्फ़ वह ठहराव है जो किसी के चले जाने के बाद मन में रह जाता है। यह किताब कहती नहीं, समझती है। अगर आपने भी कभी किसी को चाहा हो बिना उसे रोक पाए, तो शायद यह किताब आपके लिए है।
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