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गज़ल, ग़ज़ल लफ्ज़ो और जज़्बातों का मज्मू'आ है गज़ल हमें हमारे होने का एहसास कराती है ग़ज़ल हमें एक अजीब रुहानी सुकून देती है बचपन में जनाब मुनव्वर राना साहब जिनके घर के करीब ही पैदा हुआ उनकी ग़ज़ले सुना करता था और जब कॉलेज गए तो उर्दू की किताबों में मीर तकी मीर,मिर्ज़ा गालिब,अल्ताफ हुसैन हाली,दाग़ देहलवी,इकबाल और ना जानें कितने शायरों को पढ़ता था अजीब सा सुकून मिलता था शायद मेरे अंदर ग़ज़ल का शौक तभी से आ गया था फिर लिखने का शौक हुआ और बाद में जनाब राज़ नवादवी जी की किताब से मैंने ग़ज़लों की बारीकियां सीखी और बहुत छोटी सी कलम के सहारे संवारा ये मज्मू'आ आपकी खिदमत में आपकी दुआओं का तलबगार आपका फैज़ान ताज़ कुरैशी
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