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Bol आज के दौर में कई रिश्ते बदल गए हैं। मानवीय रिश्ते ही नहीं, रोटी और भूख के रिश्ते भी—तन और वस्त्र के रिश्ते भी—इंसान और समाज के रिश्ते भी। इन रिश्तों में शून्यता का एहसास मानव जीवन के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। इन्हीं शून्यता और सन्नाटे को ही तो कवि शब्द देता है तब काव्य के रूप में वह हमें उन पहलुओं से साक्षात्कार का मौक़ा देता जो हमारी दृष्टि ही नहीं कल्पना से भी ओझल होता है। रश्मि गुप्ता के यहाँ संवेदना का यही रंग हावी है जिसको उन्होंने सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर ढाला है। ‘सिर्फ़ तुम’ की कवयित्री का यह पहला काव्य-संग्रह भी इस बात के साक्ष्य के लिए काफ़ी है कि नींद के आलम में अचेतन जिस तरह बिम्बों, इशारों और मवाद का तालमेल से सपने बुनता है रश्मि के यहाँ वही काम रचनात्मक क्रिया के दौरान चेतना अंजाम देती है।

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आज के दौर में कई रिश्ते बदल गए हैं। मानवीय रिश्ते ही नहीं, रोटी और भूख के रिश्ते भी—तन और वस्त्र के रिश्ते भी—इंसान और समाज के रिश्ते भी। इन रिश्तों में शून्यता का एहसास मानव जीवन के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। इन्हीं शून्यता और सन्नाटे को ही तो कवि शब्द देता है तब काव्य के रूप में वह हमें उन पहलुओं से साक्षात्कार का मौक़ा देता जो हमारी दृष्टि ही नहीं कल्पना से भी ओझल होता है। रश्मि गुप्ता के यहाँ संवेदना का यही रंग हावी है जिसको उन्होंने सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर ढाला है। ‘सिर्फ़ तुम’ की कवयित्री का यह पहला काव्य-संग्रह भी इस बात के साक्ष्य के लिए काफ़ी है कि नींद के आलम में अचेतन जिस तरह बिम्बों, इशारों और मवाद का तालमेल से सपने बुनता है रश्मि के यहाँ वही काम रचनात्मक क्रिया के दौरान चेतना अंजाम देती है।


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  • 9788119092116
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