Teri Mahfil Mein Lekin Hum Na Honge : DPT Ki Yaad

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Bol तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे डीपीटी की याद में उनके घनिष्ठ मित्रों की प्रस्तुति है। डीपीटी यानी देवी प्रसाद त्रिपाठी, जेएनयू के प्रसिद्ध छात्र नेता, राजीव गांधी के सलाहकार, शरद पवार की पार्टी के महासचिव और राष्ट्रीय प्रवक्ता, पूर्व राज्यसभा सांसद, कवि, लेखक और चिंतक, और इन सबसे ऊपर अपूर्व वक्ता व हाज़िरजवाब ज़िन्दादिल इंसान जिनके चाहनेवाले आपको हर जगह मिलेंगे। राजनीति में तो मिलेंगे ही हर पार्टी में, साहित्य में, पत्रकारिता में, रंगकर्मियों के बीच, फ़िल्म जगत में, हर जगह उनकी प्रतिभा के प्रति लोगों में गहरा आदर रहा और लोग उनसे बहुत प्यार से पेश आए। इस पुस्तक में डीपीटी से सम्बद्ध सभी जिज्ञासाओं का उत्तर है। वह कहाँ पैदा हुए, किस पृष्ठभूमि में उनकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश हुई, वह छात्र-जीवन में कैसे थे, किस तरह वह विलक्षण वक्ता बने और विभिन्न भाषाओं पर चमत्कारी अधिकार प्राप्त किया, इलाहाबाद और जेएनयू में कैसे प्रसिद्ध हुए, राजीव गांधी के क़रीब कैसे आए, क्या परिस्थितियाँ बनीं कि वह शरद पवार से जुड़े, राज्यसभा में उनका कार्यकाल कैसा रहा, और उनकी यारबाशी के सारे क़िस्से जो उन्हें महफ़िलों का जान बनाती थीं। चूँकि लेख सारे घनिष्ठ मित्रों के हैं, इसलिए सारे तथ्य प्रामाणिक और बातें भावभीनी हैं। इस पुस्तक का एक और बड़ा आकर्षण है, उन्नीस पृष्ठों में डीपीटी का लम्बा साक्षात्कार—जिनका डीपीटी से मिलने का संयोग न हुआ, उनकी डीपीटी से मुलाक़ात हो जाएगी।

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तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे डीपीटी की याद में उनके घनिष्ठ मित्रों की प्रस्तुति है। डीपीटी यानी देवी प्रसाद त्रिपाठी, जेएनयू के प्रसिद्ध छात्र नेता, राजीव गांधी के सलाहकार, शरद पवार की पार्टी के महासचिव और राष्ट्रीय प्रवक्ता, पूर्व राज्यसभा सांसद, कवि, लेखक और चिंतक, और इन सबसे ऊपर अपूर्व वक्ता व हाज़िरजवाब ज़िन्दादिल इंसान जिनके चाहनेवाले आपको हर जगह मिलेंगे। राजनीति में तो मिलेंगे ही हर पार्टी में, साहित्य में, पत्रकारिता में, रंगकर्मियों के बीच, फ़िल्म जगत में, हर जगह उनकी प्रतिभा के प्रति लोगों में गहरा आदर रहा और लोग उनसे बहुत प्यार से पेश आए। इस पुस्तक में डीपीटी से सम्बद्ध सभी जिज्ञासाओं का उत्तर है। वह कहाँ पैदा हुए, किस पृष्ठभूमि में उनकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश हुई, वह छात्र-जीवन में कैसे थे, किस तरह वह विलक्षण वक्ता बने और विभिन्न भाषाओं पर चमत्कारी अधिकार प्राप्त किया, इलाहाबाद और जेएनयू में कैसे प्रसिद्ध हुए, राजीव गांधी के क़रीब कैसे आए, क्या परिस्थितियाँ बनीं कि वह शरद पवार से जुड़े, राज्यसभा में उनका कार्यकाल कैसा रहा, और उनकी यारबाशी के सारे क़िस्से जो उन्हें महफ़िलों का जान बनाती थीं। चूँकि लेख सारे घनिष्ठ मित्रों के हैं, इसलिए सारे तथ्य प्रामाणिक और बातें भावभीनी हैं। इस पुस्तक का एक और बड़ा आकर्षण है, उन्नीस पृष्ठों में डीपीटी का लम्बा साक्षात्कार—जिनका डीपीटी से मिलने का संयोग न हुआ, उनकी डीपीटी से मुलाक़ात हो जाएगी।


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Merk Rajkamal Prakashan
EAN
  • 9789390971985
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