Trishit Urmiyaan Antas ki
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मैं मूलतः श्रृंगार पर ही लिखता रहा हूं और विशेष कर सौंदर्य पर फिर चाहे प्रकृति हो,स्त्री सौंदर्य हो,या कि दैविक सौंदर्य या कहें आध्यात्मिक सौंदर्य, सुन्दरता सदैव प्रिय ही रहा है। प्रकृति का मानवीकरण ओह क्या कहने,ऐसा नहीं है कि मैंने अन्य विषयों पर नही लिखा पर सौंदर्य पर अधिकांशतः रचनायें लिखी हैं । मैं कोई कुशल साहित्यकार तो नहीं हूँ और ना ही छंद, अलंकारों का व्यापक ज्ञान है परन्तु मन के तृषित भाव जब अकुलाते हैं तब स्वतः ही भाव, शब्दों का संग पाकर निर्झरिणी सी मन में बहने लगती है ,और मेरा मानना है कि निर्बंध होकर बहना ज्यादा सुखद और सहज है। श्रृंगार पर मेरी ""नेह-निर्झर ""और ""प्रीति की अनुगामिनी तुम ""शीर्षक से गीत संग्रह शीघ्र प्रकाशित हो रही है। इसके अतिरिक्त मन के विविध भाव पर लिखी मेरी इस पुस्तक में ईश्वर,आस्था, प्रेम,त्याग,बलिदान,भूख,पीड़ा,और जीवन के अन्य प्रसंग भी समाहित हैं ।"
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मैं मूलतः श्रृंगार पर ही लिखता रहा हूं और विशेष कर सौंदर्य पर फिर चाहे प्रकृति हो,स्त्री सौंदर्य हो,या कि दैविक सौंदर्य या कहें आध्यात्मिक सौंदर्य, सुन्दरता सदैव प्रिय ही रहा है। प्रकृति का मानवीकरण ओह क्या कहने,ऐसा नहीं है कि मैंने अन्य विषयों पर नही लिखा पर सौंदर्य पर अधिकांशतः रचनायें लिखी हैं । मैं कोई कुशल साहित्यकार तो नहीं हूँ और ना ही छंद, अलंकारों का व्यापक ज्ञान है परन्तु मन के तृषित भाव जब अकुलाते हैं तब स्वतः ही भाव, शब्दों का संग पाकर निर्झरिणी सी मन में बहने लगती है ,और मेरा मानना है कि निर्बंध होकर बहना ज्यादा सुखद और सहज है। श्रृंगार पर मेरी ""नेह-निर्झर ""और ""प्रीति की अनुगामिनी तुम ""शीर्षक से गीत संग्रह शीघ्र प्रकाशित हो रही है। इसके अतिरिक्त मन के विविध भाव पर लिखी मेरी इस पुस्तक में ईश्वर,आस्था, प्रेम,त्याग,बलिदान,भूख,पीड़ा,और जीवन के अन्य प्रसंग भी समाहित हैं ।"
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