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Bol राकेश कबीर की इन कविताओं से गुज़रते हुए जीवन के विभिन्न पहलुओं की विसंगतियों पर सबसे पहले ध्यान जाता है। राकेश की कविताओं में उनका पूरा समय मुकम्मल ढंग से व्यक्त होता दिखता है। राकेश एक ऐसे कवि हैं जो बिम्बों की आयातित शब्दावली से नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के अपने आत्मीय सम्बन्धों के बीच से कविता की नई ध्वनि तलाश करते हैं। प्रकृति राकेश की कविताओं में विभिन्न प्रतीकों के रूप में आती है। उनकी कविताओं में आए बिम्बों की नवीनता इस बात में है कि ये प्रकृति के भीतर से ही उपजे हैं और अत्याचार से लड़ रहे हैं। इन्हें ऐसे व्यक्तियों के प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है जो व्यवस्था के अन्दर रहकर उसके अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। एक आम नागरिक के जीवन में जो व्यवस्थागत विडम्बनाएँ हैं, राकेश का कवि वहीं से अपनी कविता की ज़मीन तलाशता है। ‘स्पर्श’ कविता में एक नौकरीपेशा पिता द्वारा अपनी नन्ही बेटी से बोला गया झूठ, कविता को प्राण देता है। कवि परिवार के इस लगाव और जुड़ाव के बीच कभी भी न तो अपने समाज को भूलता है और न समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को। कुल मिलाकर कवि राकेश कबीर की कविताओं की ये चौथी किताब संवेदना और शिल्प के स्तर पर आगे बढ़ी हुई दिखती है क्योंकि इसमें जीवन के विविध पक्षों को समेटने का बेहतर प्रयास हुआ है। प्रकृति और प्राणी-जगत के बिम्बों का नवीन अर्थों में प्रयोग और झील की तरह ठहरी हुई व्यवस्था पर व्यंग्य करती कविताएँ इस संग्रह का हासिल हैं। —नीलाम्बुज सरोज

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राकेश कबीर की इन कविताओं से गुज़रते हुए जीवन के विभिन्न पहलुओं की विसंगतियों पर सबसे पहले ध्यान जाता है। राकेश की कविताओं में उनका पूरा समय मुकम्मल ढंग से व्यक्त होता दिखता है। राकेश एक ऐसे कवि हैं जो बिम्बों की आयातित शब्दावली से नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के अपने आत्मीय सम्बन्धों के बीच से कविता की नई ध्वनि तलाश करते हैं। प्रकृति राकेश की कविताओं में विभिन्न प्रतीकों के रूप में आती है। उनकी कविताओं में आए बिम्बों की नवीनता इस बात में है कि ये प्रकृति के भीतर से ही उपजे हैं और अत्याचार से लड़ रहे हैं। इन्हें ऐसे व्यक्तियों के प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है जो व्यवस्था के अन्दर रहकर उसके अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। एक आम नागरिक के जीवन में जो व्यवस्थागत विडम्बनाएँ हैं, राकेश का कवि वहीं से अपनी कविता की ज़मीन तलाशता है। ‘स्पर्श’ कविता में एक नौकरीपेशा पिता द्वारा अपनी नन्ही बेटी से बोला गया झूठ, कविता को प्राण देता है। कवि परिवार के इस लगाव और जुड़ाव के बीच कभी भी न तो अपने समाज को भूलता है और न समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को। कुल मिलाकर कवि राकेश कबीर की कविताओं की ये चौथी किताब संवेदना और शिल्प के स्तर पर आगे बढ़ी हुई दिखती है क्योंकि इसमें जीवन के विविध पक्षों को समेटने का बेहतर प्रयास हुआ है। प्रकृति और प्राणी-जगत के बिम्बों का नवीन अर्थों में प्रयोग और झील की तरह ठहरी हुई व्यवस्था पर व्यंग्य करती कविताएँ इस संग्रह का हासिल हैं। —नीलाम्बुज सरोज


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  • 9788119133680
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