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Bol ‘वक़्त ज़रूरत’ की कविताएँ उस संवेदनशीलता का प्रतीक हैं, जिससे भारत एक सुन्दर देश बनता है। यहाँ की जनता, उसकी सामूहिकता और स्वत्व—सब मिलकर एक साझा भविष्य की रचना करते हैं; लेकिन आज इसी सुंदरता के साझेपन पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। अविनाश मिश्र अपनी कविताओं के माध्यम से चेताते हैं कि नफ़रत की एक सामूहिक मानसिकता विकसित हो रही है। कविता, प्रेम और सद्भाव से आपूरित मन ही इस नफ़रत की काट है। इस संग्रह की कविताएँ इस ज़िम्मेदारी को स्वीकारती हैं। कविता के सत्त्व को कमज़ोर किए बिना, एक वेधक साहित्यिक संवेदनशीलता के साथ ये कविताएँ ‘समय की छुअन’ लिये हुए हैं। यहाँ समय का प्रत्येक स्पंदन है, लेकिन यह केवल दर्ज कर लिए जाने की बेचैनी के साथ नहीं आया है; बल्कि यह कविता की मूलभूत शर्त यानी शब्द और मानवीय सौन्दर्य के साथ आया है। इस संग्रह में किसिम-किसिम के अभागे लोग हैं—प्रेम से विहीन, भरपेट भोजन से वंचित और किसी जल रहे पेड़ की तरह घृणा से धुँधुआते लोग। अविनाश का कवि अपनी कविता के माध्यम से उनके लिए मैत्री और सद्भाव का हाथ बढ़ाता है। इक्कीसवीं सदी में शोर बहुत ज़्यादा है; इसके गए दो दशकों में भाषा, संवेदना और सामूहिकता का क्षरण बहुत तीव्रता से हुआ है। ऐसे में ये कविताएँ हमें असहाय कर देती हैं कि देखो—हम सब ये हो गए हैं। ये हमारे दुःख हैं, इन्हें देखो... ‘वक़्त ज़रूरत’ में दुःख की एक तान और उससे मुक्ति की छटपटाहट आरंभ से अंत तक विद्यमान है। इस संकलन की बहुत सारी कविताएँ उस फाँक की तरफ़ इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्ति की याददाश्त उसे सबल बनाने के बजाय उसे कमज़ोर करती हैं और ‘सबको समझ में आ सकने वाली भाषा’ के चक्कर में रचनाकार अपनी भाषा से हाथ धो बैठता है। यह संग्रह भाषा की निष्कलुषता के लिए भी स्मरणीय है। —रमाशंकर सिंह

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‘वक़्त ज़रूरत’ की कविताएँ उस संवेदनशीलता का प्रतीक हैं, जिससे भारत एक सुन्दर देश बनता है। यहाँ की जनता, उसकी सामूहिकता और स्वत्व—सब मिलकर एक साझा भविष्य की रचना करते हैं; लेकिन आज इसी सुंदरता के साझेपन पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। अविनाश मिश्र अपनी कविताओं के माध्यम से चेताते हैं कि नफ़रत की एक सामूहिक मानसिकता विकसित हो रही है। कविता, प्रेम और सद्भाव से आपूरित मन ही इस नफ़रत की काट है। इस संग्रह की कविताएँ इस ज़िम्मेदारी को स्वीकारती हैं। कविता के सत्त्व को कमज़ोर किए बिना, एक वेधक साहित्यिक संवेदनशीलता के साथ ये कविताएँ ‘समय की छुअन’ लिये हुए हैं। यहाँ समय का प्रत्येक स्पंदन है, लेकिन यह केवल दर्ज कर लिए जाने की बेचैनी के साथ नहीं आया है; बल्कि यह कविता की मूलभूत शर्त यानी शब्द और मानवीय सौन्दर्य के साथ आया है। इस संग्रह में किसिम-किसिम के अभागे लोग हैं—प्रेम से विहीन, भरपेट भोजन से वंचित और किसी जल रहे पेड़ की तरह घृणा से धुँधुआते लोग। अविनाश का कवि अपनी कविता के माध्यम से उनके लिए मैत्री और सद्भाव का हाथ बढ़ाता है। इक्कीसवीं सदी में शोर बहुत ज़्यादा है; इसके गए दो दशकों में भाषा, संवेदना और सामूहिकता का क्षरण बहुत तीव्रता से हुआ है। ऐसे में ये कविताएँ हमें असहाय कर देती हैं कि देखो—हम सब ये हो गए हैं। ये हमारे दुःख हैं, इन्हें देखो... ‘वक़्त ज़रूरत’ में दुःख की एक तान और उससे मुक्ति की छटपटाहट आरंभ से अंत तक विद्यमान है। इस संकलन की बहुत सारी कविताएँ उस फाँक की तरफ़ इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्ति की याददाश्त उसे सबल बनाने के बजाय उसे कमज़ोर करती हैं और ‘सबको समझ में आ सकने वाली भाषा’ के चक्कर में रचनाकार अपनी भाषा से हाथ धो बैठता है। यह संग्रह भाषा की निष्कलुषता के लिए भी स्मरणीय है। —रमाशंकर सिंह


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  • 9789360867546
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