Yeh Unindi Raton Ka Samay Hai

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Bol ज्योति चावला के इस तीसरे कविता-संग्रह—‘यह उनींदी रातों का समय है’ की कविताएँ प्रमाण हैं कि उनका स्वर उत्तरोत्तर अधिक राजनीतिक होता गया है। इन कविताओं में अपने समय की भयावहता को बरीकी से दर्ज करती हुई वे उसका तीव्र प्रतिरोध करती हैं और स्त्री की आजादी के ख्वाब भी रचती हैं। उनके लिए स्त्रियों के हक की लड़ाई एक राजनीतिक मामला है, जिसके रास्ते के अवरोधों की शिनाख्त वे समाज के व्यवहार में बहुत गहरे पैठकर करती हैं। स्वाभाविक ही धर्म, संस्कृति, भाषा सहित समाज की तमाम बुनियादी सत्ता-संरचनाओं के अन्दर जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता उनके निशाने पर है। उनके लिए प्रतिपक्ष पुरुष नहीं बल्कि समाज और संस्कृति के वे घटक हैं जिनसे पुरुष का पितृसत्तात्मक मनोविज्ञान निर्मित होता है। इसलिए वे अपने कवितालोक में स्वप्न-पुरुष से लेकर आदिम पुरुष तक की तलाश करती हैं और स्त्री-पुरुष अन्तर्सम्बन्धों का ऐसा पुनर्पाठ तैयार करती हैं जहाँ दोनों परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन कविताओं में एक ऐसी स्त्री दिखलाई पड़ती है जो अपने समय के संघर्षों से और उनके अन्तर्द्वन्द्वों से निर्मित हुई है; उसका सौन्दर्य आदिम, अकुंठ और संघर्ष की आभा से दीप्त है। ज्योति की कविताओं की एक और विशेषता है—उनका मुहावरा। माँ और बेटी के संवाद को प्रतीक की तरह बरतते हुए निजता से शुरू कर वे अपनी कविताओं को समूची स्त्री जाति का आह्वान बना देती हैं। इन कविताओं में स्त्री-विमर्श की एक नई दिशा तब खुलती है जब ज्योति बेटी के साथ-साथ बेटे को भी गढ़ रही स्त्री को रेखांकित करती हैं। प्रतिरोध के साथ-साथ अभिव्यक्ति के गहराते संकट को उजागर करती ये कविताएँ वस्तुत: अपने समय का समानान्तर इतिहास हैं और अपनी सूक्ष्म संवेदनशीलता में बेहतर भविष्य का स्वप्न भी।

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ज्योति चावला के इस तीसरे कविता-संग्रह—‘यह उनींदी रातों का समय है’ की कविताएँ प्रमाण हैं कि उनका स्वर उत्तरोत्तर अधिक राजनीतिक होता गया है। इन कविताओं में अपने समय की भयावहता को बरीकी से दर्ज करती हुई वे उसका तीव्र प्रतिरोध करती हैं और स्त्री की आजादी के ख्वाब भी रचती हैं। उनके लिए स्त्रियों के हक की लड़ाई एक राजनीतिक मामला है, जिसके रास्ते के अवरोधों की शिनाख्त वे समाज के व्यवहार में बहुत गहरे पैठकर करती हैं। स्वाभाविक ही धर्म, संस्कृति, भाषा सहित समाज की तमाम बुनियादी सत्ता-संरचनाओं के अन्दर जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता उनके निशाने पर है। उनके लिए प्रतिपक्ष पुरुष नहीं बल्कि समाज और संस्कृति के वे घटक हैं जिनसे पुरुष का पितृसत्तात्मक मनोविज्ञान निर्मित होता है। इसलिए वे अपने कवितालोक में स्वप्न-पुरुष से लेकर आदिम पुरुष तक की तलाश करती हैं और स्त्री-पुरुष अन्तर्सम्बन्धों का ऐसा पुनर्पाठ तैयार करती हैं जहाँ दोनों परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन कविताओं में एक ऐसी स्त्री दिखलाई पड़ती है जो अपने समय के संघर्षों से और उनके अन्तर्द्वन्द्वों से निर्मित हुई है; उसका सौन्दर्य आदिम, अकुंठ और संघर्ष की आभा से दीप्त है। ज्योति की कविताओं की एक और विशेषता है—उनका मुहावरा। माँ और बेटी के संवाद को प्रतीक की तरह बरतते हुए निजता से शुरू कर वे अपनी कविताओं को समूची स्त्री जाति का आह्वान बना देती हैं। इन कविताओं में स्त्री-विमर्श की एक नई दिशा तब खुलती है जब ज्योति बेटी के साथ-साथ बेटे को भी गढ़ रही स्त्री को रेखांकित करती हैं। प्रतिरोध के साथ-साथ अभिव्यक्ति के गहराते संकट को उजागर करती ये कविताएँ वस्तुत: अपने समय का समानान्तर इतिहास हैं और अपनी सूक्ष्म संवेदनशीलता में बेहतर भविष्य का स्वप्न भी।


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  • 9788196148782
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